बुधवार, 3 अक्तूबर 2012

विजेन्‍द्र जैन, कोटा

कुछ बच्‍चे
जिनके कंधों पर होने चाहिए थे बस्‍ते
उनके कंधे पर देखता हूँ
लटके हुए मोमजामे के थैले और
सड़क पर बिखरी हुई
प्‍लास्टिक की थैलियों को
समेटते हुए वे छोटे छोटे हाथ
सुनता हूँ उनके अबोध
हँसते मस्‍ती में गाते फि‍ल्‍मी गीत
काश !
पैबंद का दर्द जान पाते
किन्‍तु वे उसमें जींस का आनंद लेते
बेखौफ बचपन का मजाक उड़ाते
पूछना चाहता हूँ उन्‍हें रोक कर,
पर फि‍ल्‍मों से चुराया एक शबद बोलते हैं-
सॉरी ! हमें जल्‍दी है
कल नये साल की
खुशियाँ मनाई थीं न
शहर में बहुत कचरा फैला हुआ है
समेटना है, कमाई करनी है
आज खूब माल मिलेगा
और फि‍र मनायेंगे
हम भी नया साल!!

'कचरे का ड्रम'- से

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