मंगलवार, 31 दिसंबर 2013

सान्निध्य: आगत का स्‍वागत करो, विगत न जाओ भूल

सान्निध्य: आगत का स्‍वागत करो, विगत न जाओ भूल: 1- आगत का स्‍वागत करो, विगत न जाओ भूल उसको भी सम्‍मान से, करो विदा दे फूल करो विदा दे फूल, सीख लो जाते कल से तोड़ दिये यह भ्रम, बँध...

शनिवार, 26 अक्तूबर 2013

डा0 नलिन, कोटा, राजस्‍थान

इस बस्‍ती में बड़े झमेले
इक पल रोये इक पल खेले

देख चुके सब विद्यालय अब
हम ही गुरु हैं हम ही चेले

आज आपके पास हुए पर
कितने कितने पापड़ बेले

साथ सभी रहते थे फि‍र भी
सुख दुख अपने अपने झेले

आज मात्र रहते हैं सब तो
जीवन की घड़ियों के ठेले

पास हमारे प्रेम-प्रीति है
चाहे जो कोई भी ले ले

छोड़ 'नलिन' मित्रों की संगत
अच्‍छा है अब रहें अकेले।

डा0 नलिन की पुस्‍तक 'चाँद निकलता तो होगा' से साभार

गुरुवार, 22 अगस्त 2013

कन्‍हैया लाल अग्रवाल 'आदाब', आगरा

ताजमहल और उद्योग की
आपस में कब बनी है उनमें तो शुरु से ही
आपस में ठनी है।
जिन उद्यमियों ने ताजमहल बनाया था
बादशाह ने उनकी ही
जिन्‍दगी में जहर घुलवाया था ।
ताज पर काले धब्‍बे खुद
शाहजहाँ ने लगाये थे
जब उसने ताज बनाने वाले कारीगरों के
हाथ कटवाये थे।
लेकिन उनके वंशज
अब भी छोटे छोटे
ताजमहल बना रहे हैं और
वक्‍त के स्‍वयंभू बादशाहों को
बता रहे हैं कि
उद्यमियों को उजाड़ने से
उद्योग नहीं उजड़ते हैं
पुराने कारखानों की राख पर भी
नये कारखाने बनते हैं।

उनके काव्‍य संग्रह 'विविधा' से साभार। 

बुधवार, 14 अगस्त 2013

गोपाल कृष्‍ण भट्ट 'आकुल', कोटा

परिवर्तन की एक नई आधारशिला रखना है 

रि‍वर्तन की एक नई आधारशि‍ला रखना है।
न् याय मि‍ले बस इसीलि‍ए आकाश हि‍ला रखना है।
द्रवि‍त हृदय में मधुमय इक गु़लजार खि‍ला रखना है।

र दम संकट संघर्षों में हाथ मि‍ला रखना है।


मर शहीदों की शहादत का इंडि‍या गेट गवाह है।
दर वीर जब बि‍फरे अंग्रेजों का हश्र गवाह है।
 स्वाह हुए कुल के कुल अक्षोहि‍णी कुरुक्षेत्र गवाह है।
ब से जो भी हुआ आज तक सब इति‍हास गवाह है।

दो लफ्जों में उत्‍तर ढूँढ़े हो स्‍वतंत्र क्‍या पाया?
र कूचे और गली गली में क्‍यूँ सन्‍नाटा छाया?
जात पाँत का भेद मि‍टा क्‍या राम राज्‍य है आया ?
ख कर मुँह को बंद जी रहे क्‍यों आतंकी साया ?

तेरी मेरी सब की है अक्षुण्‍ण धरोहर आजादी।
हे न हम गर जागरूक पछतायेंगे जी आजादी।
र हाल न मानव मूल्‍य सहेज सके तो कैसी आज़ादी।

मेरा भारत है महान् नहीं कहते कभी अघाते।
राम रहीम कबीर सूर की वाणी को दोहराते।

भाग्‍य वि‍धाता, सत्‍य मेव जयते, जन गण मन गाते।
स्‍म रि‍वाज़ नि‍भाते और हर उत्‍सव पर्व मनाते।
ब से भारत माता की जय कह कर जोश बढ़ाते।

हका दो अपनी धरती फि‍र हरि‍त क्रांति‍ करना है ।
हार नहीं हर हाल प्रकृति‍ को अब सहेज रखना है ।
न्याय मि‍ले बस इसीलि‍ए आकाश हि‍ला रखना है।


परि‍वर्तन की एक नई आधारशि‍ला रखना है।

रविवार, 21 जुलाई 2013

सुधीर गुप्‍ता 'चक्र'

भई वाह
क्‍या बात है
तुमने
एक नन्‍हीं बूँद
गर्म तवे पर डाली
किस तरह तड़पी वह
और
अस्तित्‍वहीन हो गई

निश्चित ही उसकी
सन्‍न की आवाज
तुम्‍हें अच्‍छी लगी होगी
वरना तुम
ऐसा हरिगिज़ नहीं करते
वो नन्‍हीं बूँद
तुम्‍हारी न सही
पर
किसी चिड़िया की तो
प्‍यास बुझा सकती थी

मैं समझ रहा हूँ
तुम्‍हारे लिए
खेल  है यह
लेकिन
जल भी तो
तुम्‍हारे अस्तित्‍व का
एक हिस्‍सा है
इसलिए
सोचो
वह बूँद कहीं
तुम्‍हारे हिस्‍से की तो नहीं थी।

हाल ही में प्रकाशित श्री 'चक्र' की पुस्‍तक 'क्‍यों' से साभार। 
http://saannidhyadarpan.blogspot.in/2012/09/blog-post.html

बुधवार, 5 जून 2013

श्रीमती संध्‍या सिंह, मेरठ

'' पुनर्जन्म ''

पुनर्जन्‍म 
श्रीमती संध्‍या सिंह जी
मरघट जैसे पुस्तकालय की 
कब्रगाह सरीखी शेल्फ ,
जिसमे बरसों ......
ठोस जिल्द के ताबूत में 
ममी की तरह रखी
अनछुई 
मुर्दा किताब ,
जी उठती है अचानक 
दो हाथों की ऊष्मा पाकर ,
सांस लेने लगते हैं पृष्ठ 
अनायास 
उँगलियों का स्पर्श मिलते ही ,
धड़कने लगते हैं शब्द 
घूमती हुई 
आँख की पुतलियों के साथ ,
बड़ी फुर्ती से रंग भरने लगता है 
हर दृश्य में 
ज़ेहन का चित्रकार 
और चहल कदमी करने लगते हैं 
पन्नों से निकल कर 
किरदार,
और अंततः ...
गूंजने लगती हैं 
आवाजें भी,
कानों में सभी कुछ 
बोलने लगती है 
एक गूंगी किताब |
यह सब कुछ अचानक हो जाता है 
एक निर्जीव पुस्तक के साथ ....
क्यूँ कि ...
लौट आती है आत्मा 
उसके भीतर ,
एक संजीदा पाठक 
मिलते ही 
अकस्मात......!!

http://www.facebook.com/sandhya.singh.9231 संध्‍याजी से स्‍वीकृति ले कर उनके फेसबुक पृष्‍ठ से साभार प्रकाशित।