शुक्रवार, 21 सितंबर 2012

कवि कुलवंत सिंह

यकीं किस पर करूँ  मैं आइना भी झूठ कहता है।
दिखाता उल्टे को सीधा व सीधा उल्टा लगता है॥
दिये हैं जख्‍म उसने इतने गहरे भर न पायेंगे,
भरोसा उठ गया अब आदभी हैवान दिखता है।
शिकायत करते हैं तारे जमीं पे आके अब मुझसे,
मुश्किल है देखना इंसान को नंगा नाच करता है।
वजह तो है दोस्ती और दुश्भनी की अब तो बस पैसा,
जरूरत पड़ने पर यह दोस्त भी अपने बदलता है।
है बदले  में वही पाता जो इसने था कभी बोया,
इसे जब सह नही पाता अकेले में सुबकता है।
भले कितनी गुलाटी मार ले चालाक बन इंसां,
न हो मरजी खुदा की तब तलक पानी ही भरता है।
बने हैं पत्थरों के शहर जब से काट कर जंगल,
हक़ीक़त देख लो इंसान से इंसान डरता है।

पुस्‍तक 'क़ज़ा' से

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