सोमवार, 3 सितंबर 2012

डा0 नलिन


घर तो अपना होता है।
सदा प्‍यार करने वालों का
साझा सपना होता है।
मिले चैन की दो रोटी ही
और नींद भर नींद मिले बस।
इतना सा ही मिले जाये तो
फि‍र कुछ भी ना मिले बस।
थोड़ा थोड़ा बहे भले ही
सबका ही पर बहे पसीना।
एक दूसरे की खुशियों में
रहे फूलता सबका सोना।
नन्‍हें मुन्‍नों को घर देना
छूने देना गालों को भी।
हँसी खेल में वो खींचे तो
खिंचवा लेना बालों को भी।
घर है जीवन, जीवन है घर
अच्‍छा घर तो अच्‍छा जीवन।
घर से बनते जगती के
चित्र सुनहरे नित नित नूतन।

कोई टिप्पणी नहीं: