माँ ने ममता के घट को छलकाया है।
खोकर इस अमिरत को मन पछताया है।
जिसके आगे इन्द्रासन भी छोटा है,
भव-वैभव जिसके आगे सकुचाया है।
इतराकर अपमान नहीं इसका करना,
माँ को किस्मत वालों ने ही पाया है।
इसके बिन दर-दर भटका करता बचपन,
अंधकार को सौतेलापन लाया है।
ईश्वर की मूरत को ढूँढ़ रहा बाहर,
माँ में ही भगवान रूप मुसकाया है।
उसके आशीषों का सौरभ साथ रहे,
माँ ने ही जीवन उपवन महकाया है।
व्यर्थ गया उसका जीवन 'श्वेता' जिसने,
उसकी आँखों में आँसू छलकाया है।।
श्री विजय तन्हा, सम्पादक और अतिथि सम्पादक श्रीमती स्वर्ण रेखा मिश्रा सम्पादित पत्रकिा 'प्रेरणा' के कवयित्री विशेषांक से साभार।
खोकर इस अमिरत को मन पछताया है।जिसके आगे इन्द्रासन भी छोटा है,
भव-वैभव जिसके आगे सकुचाया है।
इतराकर अपमान नहीं इसका करना,
माँ को किस्मत वालों ने ही पाया है।
इसके बिन दर-दर भटका करता बचपन,
अंधकार को सौतेलापन लाया है।
ईश्वर की मूरत को ढूँढ़ रहा बाहर,
माँ में ही भगवान रूप मुसकाया है।
उसके आशीषों का सौरभ साथ रहे,
माँ ने ही जीवन उपवन महकाया है।
व्यर्थ गया उसका जीवन 'श्वेता' जिसने,
उसकी आँखों में आँसू छलकाया है।।
श्री विजय तन्हा, सम्पादक और अतिथि सम्पादक श्रीमती स्वर्ण रेखा मिश्रा सम्पादित पत्रकिा 'प्रेरणा' के कवयित्री विशेषांक से साभार।


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