बुधवार, 21 नवंबर 2012

रमेश चंद गोयल 'प्रसून', गाज़ियाबाद


पेड़ ने खाये थे पत्‍थर पेड़ के फल आपने

फि‍र इसी को सिर्फ़ क़िस्‍मत थी कहा कल आपने

साथियों का साथ था तो साथियों को छोड़कर

पाँव पीछे कर लिये क्‍यों देख दलदल आपने

झांकिये भीतर कोई आवाज़ देकर कह रहा

क्‍यों किया है, क्‍यों किया यह क्‍यों किया छल आपने

हाथ ही केवल नहीं मुँह तक भी काला हो गया

कोठरी में जो छुआ भूले से काजल आपने

सोच का घर बन्‍द है खिड़की व दरवाज़ा नहीं

आँख पर मुँह पर जड़ी ऊपर से साँकल आपने

आग फैली शहर में उसको बुझाने के लिए

बाँट दी चिनगारियाँ यह क्‍या किया हल आपने

पुस्‍तक 'इस शहर में' से साभार 

मंगलवार, 20 नवंबर 2012

अश्‍वनी कुमार पाठक, सिहोरा (जबलपुर)


हिन्‍दू कौन, मुस्‍लमाँ कौन्‍ा, एक ख़ुदा के बन्‍दे हैं
ज़हर भेद का बोते जो इंसाँ नहीं दरिन्‍दे हैं
कोयल, कौए, बगुले, हंस किसी जाति के कोई रंग
मुक्‍त गगन के आँगन में उड़ते सभी परिन्‍दे हैं
सब इक माटी के पुतले राम, रहीमा, अल्‍लाबख्‍श
खूँ का, दिल का रिश्‍ता, एक बाकी गोरख धन्‍धे हैं
गीता, बाइबल या कि कुरान, किसी धर्म के पोथे हों
प्रेम, अहिंसा, करुणा के ही सिद्धान्‍त चुनिन्‍दे हैं
मज़हब नहीं सिखाते हैं, बैर, बुराई, लड़ाई जंग
मुट्ठी भर ख़ुदगर्ज़ों ने रचे घिनौने फन्‍दे हैं।। 

दृष्टिकोण 8-9 (ग़ज़ल विशेषांक) से साभार

शुक्रवार, 16 नवंबर 2012

भगवत सिंह जादौन 'मयंक', कोटा


जब जीवन उपहार मिले
सबको उसका प्‍यार मिले
सद्गुण मय होवे ये जग, 
क्‍यों कोई बदकार मिले।
मानव सेवा के हित को, 
जन्‍म मुझे हर बार मिले।
ग़ैर मुजस्‍सम फि‍र ढूँढूँ, 
पहले तो साकार मिले।
तकवा तो धरती पर हो, 
न घृणित कोई व्‍यापार मिले।
मिलना तो आखिर है मिलना, 
आर मिले या पार मिले।
ठहरे दरिया से बेहतर, 
कोई तो मझदार मिले।
सुखमय हो दुनिया सारी,
दु:ख क्‍यों घरबार मिले।।

दृष्टिकोण 8-9 (ग़ज़ल विशेषांक)

सोमवार, 12 नवंबर 2012

उदयकरण 'सुमन', रायसिंह नगर (श्रीगंगानगर)

धर्म मोक्ष का धाम है ज़िन्‍दगी
अर्थ काम का मुक़ाम है ज़िन्‍दगी
भरत के लिए चरण पादुका है
लो लछमन को राम है ज़िन्‍दगी
मीरा को गिरधर गोपाल सी
संतो को राम नाम है ज़िन्‍दगी
साधक को वेदमंत्र साधना है
विषयी को गोरा चाम है ज़िन्‍दगी
सरफरोश शहीदों की नज़र में
शहादत का नाम है ज़िन्‍दगी
रिन्‍दों का साक़ी मयकदा है
सागरो मीना जाम है ज़िन्‍दगी
प्रतिम लेखनी है सृजन की
सतत गति का नाम है ज़िन्‍दगी

दृष्टिकोण 8-9 (ग़ज़ल संग्रह) से साभार 

रविवार, 11 नवंबर 2012

बुनियाद हुसैन ‘ज़हीन’, बीकानेर


आदमी कब किसी से डरता है
ये तो बस जिन्‍दगी से डरता है
क़हर ढाएगी जाने क्‍या मुझ पर
दिल तेरी खामुशी से डरता है
मुर्दादिल को ये कोन समझाए
ज़ुल्‍म, ज़िन्‍दादिली से डरता है
डर ख़ुदा का न हो अगर दिल में
आदमी आदमी से डरता है
ज़ख्‍म जिसने कभी दिये थे ‘ज़हीन’
आज तक दिल उसी से डरता है।

ग़ज़ल संग्रह ‘एहसास के रंग’ व दृष्टिकोण से साभार 

शनिवार, 10 नवंबर 2012

विपिन मणि कौशिक, कोटा



तूफ़ाँ से टकराये कौन, नैया पार लगाये कौन?
जलती हुई मशालें थामे, तम को दूर भगाये कौन?
जो संघर्षों में घायल है, उनको हक़ दिलवाये कौन?
खून पसीना बहे किसी का, बैठ मज़े से खाये कौन?
सारे दर्पण धुँधलाये हैं, चेहरा साफ़ दिखाये कौन?
जाने किसने क़त्‍ल किया है, जाने पकड़ा जाये कौन?
जो गुण्‍डे को गुण्‍डा कहता, उसके प्राण बचाये कौन?
झौंपड़ियों की पीड़ाओं को राजभवन पहुँचाये कौन?
सर ढकने की जगह न खु़द को, अपने घर में आए कौन?
किसने वीराँ किया ‘विपिन’ को, दुनिया को समझाये कौन?

पुस्‍तक 'मैं समय हूँ' से साभार

शुक्रवार, 9 नवंबर 2012

बशीर अहमद 'मयूख', कोटा


ये सच न हो तो ऐ मुंसिफ़ो, तुम क़लम हमारी जबान कर दो
ये रहबरों की ही साज़िशें हैं, जो लुट रहे कारवाँ सफ़र में।
मनीषियों, पढ़ के याद कर लो, लिखी है दीवार पर इबारत
चराग़ जो भी जलाये हमने, अगिन लगी है उन्‍हीं से घर में
ये धर्मग्रन्‍थों ने हम से बोला- करो मुहब्‍बत ख़ुदा के बन्‍दो
नज़र ये ऐसी लगी है किसकी, भरी जो नफ़रत नज़र-नज़र में
पुजारियो जा के देख आओ, कहीं तुम्‍हारा खु़दा न हो ये
पड़ी हुई है न जाने कब से, सड़ी हुई लाश मुर्दा घर में
धुआँ धुआँ आदमी हुआ है, तपिश से तहज़ीब जल रही है
कहाँ गई वो हवाऍं ठण्‍डी, कभी मिली थी जा रहगुज़र में
गुफ़ा से चलकर, गगन को छूकर, ये कौन से युग में आ गये हम
हवा में बारूद-गंध फैली, भरा हुआ खून हर डगर में
सदी की हर त्रासदी को झेला, हमारी हिम्‍मत की दाद तो दो
हामरे संकल्‍प-सूर्य ने हर निशा को, बदला है फि‍र सहर में
जो तिश्‍ना होठों की प्‍यास छू ले, मोहब्‍बतों का उजास बाँटे
ग़ज़ल तो आख़िर ग़ज़ल है यारो, ग़ज़ल कहो तुम किसी बहर में
हमारे जाने के बाद यारो, ज़माना पूछेगा तुम से आकर
वो एक शायर कहाँ गया है, कभी जो रहता था इस शहर में
जहाँ भी देखो वहीं मिलेगा, मेरे सनम का स्‍वरूप ऐसा
अनेक रस्‍ते-अभेद मंज़िल, झुकाओ सर को किसी भी दर में
दिशा-दिशा ने जिसे दुलारा, किरण ने उपनाम दे पुकारा
वहीं बिचारा ‘मयूख’ गुमनाम, हो गया अपने ही शहर में
दृष्टिकोण 8-9 (ग़ज़ल विशेषांक) से साभार


गुरुवार, 8 नवंबर 2012

बाबा कानपुरी, नोएडा


पग–पग पर मक्‍कारी क्‍यों?
अपनों से गद्दारी क्‍यों?
नन्‍हें मुन्‍ने बच्‍चों की
पीठ पे बस्‍ता भारी क्‍यों?
कीमत है जब एक समान
बर्तन हल्‍के-भारी क्‍यों?
अय्‍यारों की बस्‍ती में
फि‍रते यहाँ मदारी क्‍यों?
घर में ग़म की दौलत हे
इस पर हरेदारी क्‍यों?
नंगों की इस बस्‍ती में
आया यहाँ भिखारी क्‍यों?
पढ़े लिखों की महफि‍ल है
बातें फि‍र बाज़ारी क्‍यों?
बात करो सबकी ‘बाबा’
इतनी भी खुद्दारी क्‍यों?

दृष्टिकोण 8-9 (ग़ज़ल विशेषांक) से साभार

बुधवार, 7 नवंबर 2012

अमीन 'असर', कोटा

आँखों से अश्‍कों की बरसात चलो यूँ कर लें
अब के सावन से मुलाक़ात यूँ कर लें
आज गुजरे हुए लम्‍हों में चलो खो जाये
वरना गुजरेगी नहीं रात चलों यूँ कर लें
शेर लिखता हूँ ख़यालों में चले आओ तुम
आज कागज़ पे मुलाक़ात चलो यूँ कर लें
काटे कटता नहीं इक पल भी श्‍बे फुरक़त का
उनसे कहिएगा ये हालात चलो यूँ कर लें
मैंने ग़ज़लों में ‘असर’ उनकी ही अक्‍़कासी की
उनसे कह दें दिली जज्‍़बात चलों यूँ कर लें।।

दृष्टिकोण 8-9 (ग़ज़ल विशेषांक) से साभार  

मंगलवार, 6 नवंबर 2012

किरन राजपुरोहित 'नितिला', जोधपुर

फि‍सलने का डर चलने नहीं देता
गिरने का डर सँभलने नहीं देता
दंगे, बन्‍दूकों की दहशत, बारिश में
बच्‍चे को अब मचलने नहीं देता
सफेद लिबास, उदास सूचनी आँखें
आईना उसे अब सँवरने नहीं देता
पीगें, उमंगें मन में बहुत उठती पर
खूँटा उसको अब उछलने नहीं देता
हाथ बढ़ाती हैं खुशियाँ अक्‍सर
समाज का डर सँभलने नहीं देता।।

दृष्टिकोण 8-9 (ग़ज़ल विशेशांक) से साभार

रविवार, 4 नवंबर 2012

गिरीश कांत सक्‍सैना 'दिवाकर', नई दिल्‍ली

घना कोहरा उमस अमावस की काली घटाएँ
एक उजली सी किरण को तरस गया है आदमी
चारों और खून ही खून, शोर शराबा है
ज़िन्‍दगी की आस को तड़प गया है आदमी
हर देहरी, खिड़की चौखट दुबक रो रही
भेड़ियों की भीड़ में भटक गया है आदमी
भाषा जाति धर्मों का, ऐसा ज़लज़ला उठा
अब अपनी ही नज़र में गिर गया है आदमी
चील गिद्ध बाज़ आज़ादी के गीत गा रहे
एक मीठी सी तान को तरस गया है आदमी

दृष्टिकोण-8-9  (ग़ज़ल विशेषांक) से साभार

शनिवार, 3 नवंबर 2012

मोहन भारतीय, भिलाई

माँ तो बस होती है माँ।।
शब्‍दातीत अनूप अनुपम, अतुलनीय होती है माँ
भिनसारे उठ चूल्‍हा चक्‍की, सारे दिन खटती रहती
पत्‍नी बहिन सुता माँ बनकर, खण्‍ड खण्‍ड बँटती रहती
देर रात तक जगती रहती, जाने कब सोती है माँ।।
घर भर की सुख सुविधाओं की, माला रोज पिरोती है
तुलसीजी पर माथ नवाकर, माँगे रोज मनौती है
आशीषों की फसल उगाती,सुख सपने बोती है माँ।।
धरती जैसी सहनशीलता, आसमान सा हृदय उदार
सागर सी ममता लहराती, जिसके मन मे अपरम्‍पाऱ
किसी प्रार्थना के मंगलमय, भावों की होती है माँ।।
दीवाली के खील बताशे, होली गुझियाओं में
ईद मुबारक की खुशियों में, क्रिसमस की दुआओं में
मंगलमयी कामनाओं सी, वरदहस्‍त हाती है माँ।।
रामायण चौपाई जैसी, गीता के उपदेशों सी
मस्जिद की आजानों जैसी, बाइबिल के अनुदेशों सी
तीरथ जैसी वन्‍दनीय और पूजनीय होती है माँ।।

दृष्टिकोण से साभार 


शुक्रवार, 2 नवंबर 2012

शिव डोयले, विदिशा

छंद यदि टूटा तो गीतों का मान चला जाएगा
सुर ताल न साधे, तो समझो गान चला जाएगा
भाषा को निर्धन मत बनने देना कवि, साधक
जग हँसेगा औश्र सरस्‍वती का सम्‍मान चला जाएगा।

भाषा कैसी भी वतन की पहचान चाहिए

स्‍नेह आशीष देने वाली माँ महान् चाहिए

दूसरों के आँगन में कभी गुजर बसर नहीं हाती

सुकूँ से जीने मरने को बस हिन्‍दुस्‍तान चाहिए

दृष्टिकोण-5 से साभार

गुरुवार, 1 नवंबर 2012

एस0 एम0 अब्‍बास, जौनपुर (उ0 प्र0)

खुशबू इत्र में होती है
फूल, अगर और धूप में भी
मगर एक खुशबू और भी है सब से अलग,
बिना किसी सामग्री वाली शुद्ध-पवित्र,
यह खुशबू प्‍यार की है
एकता और सौहार्द की है
माँ का बेटे से, बहिन का भाई से-
जो प्‍यार होता है,
उससे घर परिवार महकता है
मन चाहता है कि मेरे पड़ौस के लोग
एक दूसरे के साथ ऐसी मोहब्‍बत करें
इतना प्‍यार दें कि मेरा पड़ौस,
पड़ौस का एक-एक घर-आँगन
सब महक जायें सौहार्द-भाईचारा और
अपनेपन की खुशबू से, मगर उसी पल
याद आ जाता है ‘देशप्रेम’
जो कितना ऊँचा, कितना भारी, कितना पवित्र है
देश अपने नाम पर
मर मिटने वाले को अमर बना देता है
आदमी के ऊपर से उसकी पीढ़ी दर पीढ़ी का
कर्ज़ उतार देता है।।  
दृष्टिकोण-7 से साभार